Tulsidas Ke Dohe In Hindi / तुलसीदास जी के दोहे अर्थ सहित

तुलसीदास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित / Tulsidas Ke Dohe In Hindi

जन्म – 1589 विक्रम संवत्

जन्म स्थान – राजापुर, बांदा, उ०प्र०

पिता – आत्माराम दुबे

माता – हुलसी देवी

मृत्यु – 1680 विक्रम संवत्

 

Tulsidas Ke Dohe In Hindi – गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म 1589 विक्रम संवत् में उ०प्र० के बाँदा जिले के राजापुर गाँव में हुआ था, इनके पिता पंडित आत्माराम दुबे तथा माता हुलसी देवी थी ! कुछ विद्वान् इनकी रचित पंक्ति “मैं पुनि निज गुरु सन सुनि,कथा सो सुकरखेत” के आधार पर इनका जन्म एटा जिले के सोरो नामक ग्राम में मानते है, अतः विद्वान् के प्रमाण स्वरुप इनके जन्म स्थान में राजापुर ग्राम को अधिक प्रमाणिकता मिली है !

 

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान ।

तुलसी दया न छांड़िए ,जब लग घट में प्राण ।।

 

गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि दया ही धर्म का मूल है और इसके विपरीत अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है।

 

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि ।।

 

जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं वे क्षुद्र और पापमय होते हैं ।दरअसल ,उनका तो दर्शन भी उचित नहीं होता ।

 

 

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर ।

बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ।।

 

तुलसीदासजी कहते हैं कि मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं ।किसी को भी वश में करने का ये एक मन्त्र होते हैं इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोडकर मीठा बोलने का प्रयास करे ।

 

सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ।।

 

गोस्वामीजी कहते हैं कि मंत्री, वैद्य और गुरु —ये तीन यदि भय या लाभ की आशा से (हित की बात न कहकर ) प्रिय बोलते हैं तो (क्रमशः ) राज्य,शरीर एवं धर्म – इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है ।

 

मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ।।

 

तुलसीदास जी कहते हैं कि मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने को तो अकेला है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है ।

 

सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ।

सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ।।

 

स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता ,वह हृदय में खूब पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है ।

 

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।

बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ।।

 

शूरवीर तो युद्ध में शूरवीरता का कार्य करते हैं ,कहकर अपने को नहीं जनाते ।शत्रु को युद्ध में उपस्थित पा कर कायर ही अपने प्रताप की डींग मारा करते हैं ।

 

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर ।

सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ।।

गोस्वामीजी कहते हैं कि सुंदर वेष देखकर न केवल मूर्ख अपितु चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं ।सुंदर मोर को ही देख लो उसका वचन तो अमृत के समान है लेकिन आहार साँप का है ।

 

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु ।

जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास ।।

 

राम का नाम कल्पतरु (मनचाहा पदार्थ देनेवाला )और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर ) है,जिसको स्मरण करने से भाँग सा (निकृष्ट) तुलसीदास भी तुलसी के समान पवित्र हो गया ।

 

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ।।

तुलसीदासजी कहते हैं कि हे मनुष्य ,यदि तुम भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखरूपी द्वार की जीभरुपी देहलीज़ पर राम-नामरूपी मणिदीप को रखो ।

 

बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय ।

आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय ।।

 

तेजहीन व्यक्ति की बात को कोई भी व्यक्ति महत्व नहीं देता है, उसकी आज्ञा का पालन कोई नहीं करता है. ठीक वैसे हीं जैसे, जब राख की आग बुझ जाती है, तो उसे हर कोई छूने लगता है.

 

तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक ।

साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसे एक ।।

 

तुलसीदास जी कहते हैं कि विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है. ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और राम ( भगवान ) का नाम.

 

काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान ।

तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ।।

जब तक व्यक्ति के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं. तबतक एक ज्ञानी व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक हीं जैसे होते हैं.

 

आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह ।

तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ।।

 

जिस स्थान या जिस घर में आपके जाने से लोग खुश नहीं होते हों और उन लोगों की आँखों में आपके लिए न तो प्रेम और न हीं स्नेह हो. वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की हीं वर्षा क्यों न होती हो.

 

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर

अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥

हे रघुवीर, मेरे जैसा कोई दीनहीन नहीं है और तुम्हारे जैसा कोई दीनहीनों का भला करने वाला नहीं है. ऐसा विचार करके, हे रघुवंश मणि.. मेरे जन्म-मृत्यु के भयानक दुःख को दूर कर दीजिए.

 

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥

 

जैसे काम के अधीन व्यक्ति को नारी प्यारी लगती है और लालची व्यक्ति को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे हीं हे रघुनाथ, हे राम, आप मुझे हमेशा प्यारे लगिए.

 

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।

श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ।।

 

हे उमा, सुनो वह कुल धन्य है, दुनिया के लिए पूज्य है और बहुत पावन (पवित्र) है, जिसमें श्री राम (रघुवीर) की मन से भक्ति करने वाले विनम्र लोग जन्म लेते हैं.

 

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।

अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥

 

राम मच्छर को भी ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी छोटा बना सकते हैं. ऐसा जानकर बुद्धिमान लोग सारे संदेहों को त्यागकर राम को हीं भजते हैं.

 

‘तुलसी’ किएं कुंसग थिति, होहिं दाहिने बाम ।

कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम ।।

बसि कुसंग चाह सुजनता, ताकी आस निरास ।

तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास ।।

 

बुरे लोगों की संगती में रहने से अच्छे लोग भी बदनाम हो जाते हैं. वे अपनी प्रतिष्ठा गँवाकर छोटे हो जाते हैं. ठीक उसी तरह जैसे, किसी व्यक्ति का नाम भले हीं देवी-देवता के नाम पर रखा जाए, लेकिन बुरी संगती के कारण उन्हें मान-सम्मान नहीं मिलता है. जब कोई व्यक्ति बुरी संगती में रहने के बावजूद अपनी काम में सफलता पाना चाहता है और मान-सम्मान पाने की इच्छा करता है, तो उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती है. ठीक वैसे हीं जैसे मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम “गया” पड़ गया.

 

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥

काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥

 

जो लोग मनुष्य का शरीर पाकर भी राम का भजन नहीं करते हैं और बुरे विषयों में खोए रहते हैं. वे लोग उसी व्यक्ति की तरह मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं, जो पारस मणि को हाथ से फेंक देता है और काँच के टुकड़े हाथ में उठा लेता है.

 

मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ।।

 

परिवार के मुखिया को मुँह के जैसा होना चाहिए, जो खाता-पीता मुख से है और शरीर के सभी अंगों का अपनी बुद्धि से पालन-पोषण करता है.

 

Tulsidas Ke Dohe In Hindi

चित्रकुट के घाट पर भई संतन की भीर।

तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुबीर।।

 

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।

सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।

 

गोधन गजधन बाजिधन और रतन धन खान।

जब आवत सन्‍तोष धन, सब धन धूरि समान।।

 

एक ब्‍याधि बस नर मरहिं ए साधि बहु ब्‍याधि।

पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि।।

 

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहु ओर।

बसीकरण एक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।।

 

बारि मथें घृत बरू सिकता ते बरू तेल।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।

 

नामु राम को कलपतरू क‍लि कल्‍यान निवासु।

जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास।।

 

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।

विद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।

 

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पावँर पापमय तिन्‍हहि बिलोकति हानि।।

 

सहज सुहृद गुर स्‍वामि सिख जो न करइ सिर मानि।

सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।

 

नेम धर्म आचार तप ग्‍यान जग्‍य जप दान।

भेषज पुनि कोटिन्‍ह नहिं रोग जाहिं हरिजान।।

 

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्‍यान संत सुर आहिं।

कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं।।

 

बिरति चर्म असि ग्‍यान मद लोभ मोह रिपु मारि।

जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि।।

 

ब्रह्मज्ञान बिनु नारि नर कहहीं न दूसरी बात।

कौड़ी लागी लोभ बस करहिं बिप्र गुर बात।।

 

जाकी रही भावना जैसी।

हरि मूरत देखी तिन तैसी।।

 

सचिव बैद गुरू तीनि जौ प्रिय बो‍लहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर कोइ होइ बेगिहीं नास।।

 

सुरनर मुनि कोऊ नहीं, जेहि न मोह माया प्रबल।

अस विचारी मन माहीं, भजिय महा मायापतिहीं।।

 

देव दनुज मुनि नाग मनुज सब माया विवश बिचारे।

तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु कहा अपनपो हारे।।

 

फोरहीं सिल लोढा, सदन लागें अदुक पहार।

कायर, क्रूर , कपूत, कलि घर घर सहस अहार।।

 

सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा।

जिम हरि शरण न एक हू बाधा।

तुलसी हरि अपमान तें होई अकाज समाज।

राज करत रज मिली गए सकल सकुल कुरूराज।।

 

तुलसी ममता राम सों समता सब संसार।

राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार।।

 

नीच निचाई नही तजई, सज्जनहू के संग।

तुलसी चंदन बिटप बसि, बिनु बिष भय न भुजंग।।

 

राम दूरि माया बढ़ती, घटती जानि मन माह।

भूरी होती रबि दूरि लखि सिर पर पगतर छांह।।

 

नाम राम को अंक है, सब साधन है सून।

अंक गए कछु हाथ नही, अंक रहे दास गून।।

 

तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन।

अब तो दादुर बोलिहं हमें पूछिह कौन।।

 

होई भले के अनभलो, होई दानी के सूम।

होई कपूत सपूत के ज्‍यों पावक में धूम।।

 

तुलसी अपने राम को, भजन करौ निरसंक।

आदि अन्‍त निरबाहिवो जैसे नौ को अंक।।

 

तुलसी इस संसार में सबसे मिलियो धाई।

न जाने केहि रूप में नारायण मिल जाई।।

 

तुलसी साथी विपत्ति के विद्या, विनय, विवेक।

साहस सुकृति सुसत्‍य व्रत राम भरोसे एक।।

 

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया ना छोडिये जब तक घट में प्राण।।

 

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।

अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए।।

 

तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग।

सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग।।

 

राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि।

राग न रोष न दोष दु:ख सुलभ पदारथ चारी।।

हरे चरहिं, तापाहं बरे, फरें पसारही हाथ।

तुलसी स्‍वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ।।

 

बिना तेज के पुरूष अवशी अवज्ञा होय।

आगि बुझे ज्‍यों रख की आप छुवे सब कोय।।

 

जड़ चेतन गुन दोषमय विश्‍व कीन्‍ह करतार।

संत हंस गुन गहहीं पथ परिहरी बारी निकारी।।

 

प्रभु तरू पर, कपि डार पर ते, आपु समान।

तुलसी कहूँ न राम से, साहिब सील निदान।।

 

मनि मानेक महेंगे किए सहेंगे तृण, जल, नाज।

तुलसी एते जानिए राम गरीब नेवाज।।

 

मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक।

पालै पोसै सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक ।।

 

काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान।

तौ लौं पण्डित मूरखौ तुलसी एक समान।।

 

आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह।

तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।।

 

मो सम दीन न दीन हित तुम्‍ह समान रघुबीर।

अस बिचारी रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।

 

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।

 

सो कुल धन्‍य उमा सुनु जगत पूज्‍य सुपुनीत।

श्रीरघुबीर परायन जेहि नर उपज बिनीत।।

 

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।

अस बिचारी तजि संसय रामहि भजहि प्रबीन।।

 

तुलसी किएं कुसंग थिति, होहि दाहिने बाम।

कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकर नाम।।

 

बसि कुसंग चाह सुजनता, ता‍की आस निरास।

तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास।।

 

सो तनु धरि हरि भजहि न जे नर।

होहि बिषय रत मंद मंद तर।।

 

काँच किरिच बदलें ते लेहीं।

कर ते डारि परस मनि देहीं।।

 

तुलसी जे की‍रति चहहिं, पर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मसि लागहै, मिटिहि न मरहि धोइ।।

 

तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।

तुलसी जिअत बिडम्‍बना, परिनामहु गत जान।।

 

बचन बेष क्‍या जानिए, मनमलील नर नारि।

सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारी।।

 

राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार।।

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